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Sunday, 17 December 2017

सोडियम, पौटैशियम, मैग्नीशियम एवं कैल्शियम की जैववैज्ञानिक भूमिका

जीवन के सभी आधारभूत रसायन (प्रोटीन, न्यूक्लिक अम्ल, कार्बोहाइड्रेट, विटामिन, हार्मोन इत्यादि) कुछ गिने-चुने मूल तत्वों से बने होते हैं जैसे कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, नाइट्रोजन, सल्फर एवं फॉस्फोरस। इनमें सबसे प्रमुख कार्बन है। शरीर के लिए सबसे महत्वपूर्ण कार्बनिक यौगिक कार्बोहाइड्रेट, वसा एवं प्रोटीन हैं।


स्टार्च व शुगर में सभी प्रकार के कार्बोहाइड्रेट होते हैं जो सजीवों में ऊर्जा के प्राथमिक स्रोत हैं। प्रोटीन से संयोजी ऊतकों, मांसपेशियों और त्वचा का निर्माण होता है। रक्त में पाया जाने वाला ऑक्सीजन वाहक अणु हीमोग्लोबिन है जो एक प्रकार का प्रोटीन है। हीमोग्लोबिन में प्रतिपिंड होते हैं जो रोगों के प्रति रक्षा कवच का कार्य करते हैं। सभी प्रोटीनों में सबसे महत्वपूर्ण प्रोटीन एन्जाइम होता है। यह शरीर में होने वाले सभी रासायनिक परिवर्तनों का कारक एवं निर्देशक होता है। एन्जाइम से भोजन के पचने में मदद मिलती है।


सोडियम, पौटैशियम, मैग्नीशियम एवं कैल्शियम की जैववैज्ञानिक भूमिका


सोडियम, कैल्शियम, लोहा और फॉस्फोरस के अतिरिक्त लगभग 27 ऐसे तत्व हैं जो जैवरासायनिक अभिक्रिया में अतिआवश्यक हैं। पोटैशियम एक महत्वपूर्ण एन्जाइम सक्रियक है और तंत्रिका तथा ह्दय प्रकार्य में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। पोटैशियम कोशिकाओं में ग्लूकोज के उपापचय एवं प्रोटीन संश्लेषण में आवश्यक होता है। मैग्नीशियम सभी जीवों के लिए अत्आवश्यक होता है। यदि भोजन में फास्फोरस की मात्रा अधिक हो तो मैग्नीशियम, मैग्नीशियम फास्फेट बनकर अवक्षेपित हो जाता है। कैल्शियम भी सभी जीवों के लिए महत्वपूर्ण तत्व है। इससे मजबूत कंकाल तंत्र का निर्माण होता है। यह मांसपेशियों के संकुचन और हार्मोन स्रावित होने की क्रिया को पे्ररित करता है। शरीर में कैल्शियम की अधिक मात्रा होने से किडनी व गाल ब्लैडर में पथरी हो जाती है।


बायोटेक्नोलॉजी
बायोटेक्नोलॉजी का अर्थ है जीव विज्ञान के क्षेत्र में टेक्नोलॉजी का विस्तार। मुख्यत: यह जीवाणुओं, प्राणियों या पेड़-पौधों की कोशिकाओं या एन्जाइम के प्रयोग के द्वारा कुछ पदार्र्थों के संश्लेषण या भंजन या रूपांतरण से संबंधित है। यह एक अंत: विषयी विज्ञान है जिसमें विज्ञान की अनेक विधाएं जैसे जैव रसायन, सूक्ष्म जीवविज्ञान, रसायन अभियांत्रिकी आदि का समन्वय है।
बायोटेक्नोलॉजी के अनुप्रयोग


(1) इंसुलिन का उत्पादन- यह एक प्रोटीन है जो अग्नाशय द्वारा स्रावित होती है तथा रक्त में शुगर की मात्रा को नियंत्रित करता है। आज बायोटेक्नोलॉजी की प्रगति से यह संभव है कि एक इंसुलिन उत्पादन के लिए उत्तरदायी संश्लेषित जीन को कृत्रिम रूप से बनाकर ई. कोलाई जीवाणु के प्लाजमिड से जोड़ दिया जाये। अब इंसुलिन मरीजों के लिए आसानी से कम कीमत में उपलब्ध होने लगा है।






(2) इंटेरफेरॉन का उत्पादन- पॉलिपेप्टाइडो के उस समूह को इंटरफेरॉन कहते हैं जिनमें विषाणुओं के संदमन की क्षमता है। इंटरफेरॉन रक्त में विद्यमान घातक पारिसंचारी कोशिकाओं को क्रियाशील बनाते हैं जिससे वे विषाणुओं पर आक्रमण करके उन्हें नष्ट करना शुरू कर देते हैं। इनके पाश्र्व प्रभाव नहीं होते हैं और ये जुकाम, फ्लू, यकृतशोथ और हर्पीज के इलाज के लिए उपयुक्त हैं। 1980 में दो अमेरिकी वैज्ञानिकों- गिलबर्ट और वाइजमान ने बायोटेक्नोलॉजी से इंटरफेरान जीन को कोलॉन बैसिली नामक बैक्टीरिया में क्लोन किया।






(3) हार्मोन का उत्पादन- हार्मोन वे यौगिक हैं जो अन्त:स्रावी ग्रन्थियों द्वारा स्रावित किए जाते हैं। इनका मुख्य कार्य लक्ष्य कोशिकाओं या अंगों के साथ पारस्परिक क्रियाओं द्वारा शरीर के महत्वपूर्ण प्रकार्र्यों को नियंत्रित करना है। कई बीमारियां जो इन हार्मोनों की कमी से होती हैं उनको ठीक करने के लिए हार्मोन को बाहर से दिए जाने की जरूरत होती है। बायोटेक्नोलॉजी की तकनीक, रिकॉम्बीनेंट डीएनए टेक्नोलॉजी व जीन क्लोनिंग से इनका उत्पादन संभव हो सका है। इस तकनीक से सोमाटोस्टेटिन हार्मोन और सोमेटोट्रॉपिन सफलतापूर्वक बनाए गए हैं।






एन्जाइम टेक्नोलॉजी- एन्जाइम जीवित कोशिकाओं में पाए जाने वाले जैव अणु हैं। वे सभी जैव रासायनिक अभिक्रियाओं के लिए उत्प्रेरक का काम करते हैं। इनके बिना जीवन का अस्तित्व संभव नहीं है।
एन्जाइम का उपयोग सदियों से कई औद्योगिक प्रक्रियाओं जैसे बेकिंग, निसवन, किण्वन, खाद्य परिरक्षण आदि में होता रहा है। आज एन्जाइम प्रौद्योगिकी कम खर्च में, अधिक दक्षता से और अधिक शुद्ध अवस्था में दवाओं और कृषि रसायनों का उत्पादन करने में सक्षम है। परंपरागत रूप से एन्जाइमों का पृथ्थकरण प्राणी और पौधों से किया जाता रहा है। लेकिन अब सूक्ष्मजीवों से पृथ्थकृत एन्जाइमों का उपयोग दिनों-दिन लोकप्रिय हो रहा है। सुअर के अग्नाशयी लाइपेज, घोड़े का यकृत ऐल्कोहल डिहाइड्रोजेनेज, काइमोट्रिप्सिन और ट्रिप्सिन व्यापारिक रूप से उपलब्ध एन्जाइमों के कुछ उदाहरण हैं।






किण्वन बायोटेक्नोलॉजी- किण्वन टेक्नोलॉजी की एक ऐसी तकनीक है जिससे एन्जाइमों या पूर्ण जीवित कोशिकाओं द्वारा कम उपयोगी कार्बनिक पदार्र्थों से अधिक उपयोगी कार्बनिक पदार्थ बनाए जाते हैं। सभी कोशिकाओं में ग्लूकोज को पाइरुवेट में परिवर्तित करने की क्षमता होती है जिससे वायुवीय परिस्थितियों में प्रति ग्लूकोज अणु दो एटीपी अणु बनते हैं। ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में पाइरुविक एसिड से लेक्टिक एसिड या एथिल अल्कोहल बनता है। सूक्ष्मजीवों की इसी क्षमता का उपयोग किण्वन क्रिया में किया जाता है।
किण्वन उद्योग में कई तरह के जीवों का उपयोग किया जाता है। इनमें खमीर, बैक्टीरिया और फफूंदी मुख्य हैं। ये तेजी से बढऩे में और एक ही प्रकार की एन्जाइम बनाने में बिल्कुल समान हैं। किण्वन बायोटेक्नोलॉजी के क्षेत्र में शराब, बियर, पनीर, सिरका आदि की सबसे ज्यादा मांग है।
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