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Wednesday, 25 May 2016

गोलीय दर्पण से प्रकाश का परावर्तन

गोलीय दर्पण से प्रकाश का परावर्तन

गोलीय दर्पण (Spherical Mirror) वैसा दर्पण होता है, जिसकी परावर्तक सतह (Reflecting Surface) काँच के खोखले गोले का हिस्सा होती है। गोलीय दर्पण दो प्रकार के होते हैः अवतल दर्पण (Concave Mirror)  और उत्तल दर्पण (Convex Mirror)।
अवतल दर्पण में प्रकाश की परावर्तक सतह भीतर की तरफ मुड़ी (Bent)  हुई या अवतल सतह वाली होती है। एक चम्मच की भीतरी चमकदार सतह अवतल दर्पण का उदाहरण है। उत्तल दर्पण में प्रकाश की परावर्तक सतह बाहर की ओर उभरी हुई या उत्तल सतह वाली होती है। चम्मच का पिछला हिस्सा उत्तल दर्पण का उदाहरण है।
वक्रता केंद्रः गोलीय दर्पण में वक्रता केंद्र (centre of curvature) दर्पण के खोखले गोले का केंद्र बिन्दु होता है। अवतल दर्पण में वक्रता केंद्र दर्पण के सामने होता है, लेकिन उत्तल दर्पण में वक्रता केंद्र दर्पण के पीछे होता है।
ध्रुव (Pole): गोलीय दर्पण पर केंद्र बिन्दु ध्रुव (pole) कहलाता है।
वक्रता त्रिज्या (radius of curvature): वक्रता केंद्र और ध्रुव के बीच की दूरी |
प्रधान अक्ष (Principal axis): वक्रता केंद्र और ध्रुव के बीच से होकर गुजरने वाली सीधी रेखा ।
दर्पण का विवर (Aperture of mirror): दर्पण का वह हिस्सा जिससे प्रकाश का परावर्तनहोता है|
अवतल दर्पण का मुख्य फोकसः प्रधान अक्ष का वह बिन्दु,जहां पर अवतल दर्पण से परावर्तित होने के बाद प्रकाश की सभी किरणें,जोकि अक्ष के समानांतर होती हैं, संकेंद्रित हो जाती हैं।
अवतल दर्पण की फोकस दूरी (Focal length): ध्रुव और मुख्य फोकस के बीच दूरी।
उत्तल दर्पण का मुख्य फोकसः  प्रधान अक्ष का वह बिन्दु, जहां पर उत्तल दर्पण से परावर्तित होने के बाद प्रकाश किरणें बिखर जाती हैं।
अवतल दर्पण द्वारा निर्मित प्रतिबिंबों को प्राप्त करने के नियम
नियम 1: जब प्रधान अक्ष के समानांतर वाली प्रकाश किरण परावर्तित होती है, तो वह उसके फोकस से होकर गुजरती है।
नियम 2: जब प्रकाश किरण वक्रता केंद्र से होकर गुजरती है, तो उसी पथ पर वापस परावर्तित हो जाती है।
नियम 3: जब प्रकाश किरण फोकस से होकर गुजरती है, तो परावर्तन के बाद वह मुख्य अक्ष के समानांतर हो जाती है।
नियम 4: ध्रुव पर पड़ने वाली प्रकाश की किरण, मुख्य अक्ष के साथ समान कोण बनाते हुए वापस परावर्तित हो जाती है।
अवतल दर्पण द्वारा प्रतिबिंब का निर्माण
स्थिति 1 (Case 1): जब एक वस्तु को अवतल दर्पण के ध्रुव और फोकस ( P और F के बीच) रखा जाता है, तो प्रकाश की किरण फोकस और वक्रता केंद्र से होकर गुजरेगी। परावर्तित होने वाली दोनों किरणें बाईं तरफ एक दूसरे को नहीं काटेंगी और इस प्रकार प्रतिबिंब पीछे की तरफ बनेगा। बना हुआ प्रतिबिंब होगा–
  • दर्पण के पीछे
  • आभासी और सीधा (Virtual and Erect)
  • वस्तु से बड़ा
स्थिति 2: जब वस्तु को फोकस (F पर) रखा जाता है, तो प्रकाश की परावर्तित किरणें फोकस और वक्रता केंद्र से होकर गुजरती हैं। बना हुआ प्रतिबिंब होगा–
  • अनंत में
  • वास्तविक और उल्टा
  • बहुत अधिक बड़ा
स्थिति 3: जब वस्तु को फोकस और वक्रता केंद्र (F और C के बीच) रखा जाएगा, तो पहली किरण फोकस से और दूसरी किरण वक्रता केंद्र से होकर गुजरती है। जब इन किरणों को नीचे की दिशा में और बढ़ाया जाता है, तो बनने वाला प्रतिबिंब होता है–
  • वास्तविक और उल्टा
  • वस्तु से बड़ा
स्थिति 4: जब किसी वस्तु को वक्रता केंद्र पर (C पर) रखा जाता है, तो दोनों किरणें फोकस से होकर गुजरती हैं। बनने वाला प्रतिबिंब होता है–
  • वक्रता केंद्र पर
  • वास्तविक और उल्टा
  • वस्तु से आकार में छोटा
स्थिति 5: जब वस्तु वक्रता केंद्र से दूर ( C से दूर) हो, तो बनने वाला प्रतिबिंब होगा–
  • फोकस और वक्रता केंद्र के बीच
  • वास्तविक और उल्टा
  • वस्तु से छोटा
स्थिति 6: जब एक वस्तु अनंत पर (At Infinity) हो, तो बनने वाला प्रतिबिंब होगा–
  • फोकस पर
  • वास्तविक और उल्टा
  • वस्तु से बहुत छोटा
अवतल दर्पण का उपयोग
  • टॉर्च, वाहनों की हेड–लाइट और सर्च लाइट में शक्तिशाली बीम प्रकाश प्राप्त करने के लिए परावर्तक के रूप में।
  • शेविंग (दाढ़ी) दर्पणों के तौर पर।
  • इनका प्रयोग दंत चिकित्सक दांतों को बड़े रूप में देखने के लिए करते हैं।
  • इनका प्रयोग सौर ऊर्जा के क्षेत्र में सौर भट्टियों को गर्म करने के लिए, सूर्य की किरणों को फोकस करने के लिए किया जाता है।
उत्तल दर्पण द्वारा निर्मित प्रतिबिंबों को प्राप्त करने के नियम
नियम 1: परावर्तन के बाद, मुख्य अक्ष के समानांतर प्रकाश की किरण फोकस से आती प्रतीत होती है।
नियम 2: वक्रता केंद्र की ओर जाने वाली प्रकाश किरण उसी मार्ग पर वापस परावर्तित हो जाती है।
नियम 3: परावर्तन के बाद फोकस की तरफ जाने वाली प्रकाश की किरण मुख्य अक्ष के समानांतर हो जाती है।
नियम 4: ध्रुव पर पड़ने वाली प्रकाश की किरण मुख्य अक्ष के साथ उतना ही कोण बनाते हुए परावर्तित हो जाती है
उत्तल दर्पण द्वारा प्रतिबिंब का निर्माण
स्थिति 1: जब किसी वस्तु को ध्रुव और अनंत के बीच ( P और अनंत के बीच) कहीं भी रखा जाता है, तो बनने वाला प्रतिबिंब होता हैः
  • ध्रुव और फोकस के बीच दर्पण के पीछे
  • आभासी और सीधा
  • छोटा
स्थिति 2: जब वस्तु को अनंत (At Infinity) पर रखा जाता है, तो बनने वाला प्रतिबिंबः
  • दर्पण के पीछे फोकस पर
  • आभासी और सीधा
  • बहुत छोटा
उत्तल दर्पण का उपयोग
  • वाहन चालकों को पीछे वाले यातायात के बहुत बड़े क्षेत्र को देखने में सक्षम बनाता है।
  • बड़े उत्तल दर्पणों का प्रयोग 'दुकान सुरक्षा दर्पण' के तौर पर किया जाता है।
गोलीय दर्पण के लिए साइन कंवेंशन
गोलीय दर्पण के चित्र आरेखों में विभिन्न दूरियों को मापने के लिए न्यू कार्टिजियन साइन कंवेंशन (New Cartesian Sign Convention)  का प्रयोग किया जाता है। न्यू कार्टिजियन साइन कंवेंशन के अनुसारः
  • दर्पण के ध्रुव से सभी दूरियों को मूल रूप में मापा जाता है।
  • इंसीडेंट लाइट की दिशा में मापी जाने वाली दूरियों को सकारात्मक रूप में लिया जाता है।
  • इंसीडेंट लाइट (incident light) की विपरीत दिशा में मापी जाने वाली दूरियों को नकारात्मक रूप में लिया जाता है|
  • मुख्य अक्ष के ऊपर की ओर और लंबवत मापी गई दूरियों को सकारात्मक रूप में लिया जाता है।
  • मुख्य अक्ष से नीचे की ओर और लंबवत मापी गई दूरियों को नकारात्मक रूप में लिया जाता है।
वस्तु को हमेशा दर्पण के बाईं ओर रखा जाता है, ताकि इंसीडेंट लाइट की दिशा बाईं से दाईं तरफ हो। चूंकि इंसीडेंट लाइट हमेशा बाईं से दाईं तरफ जाता है, इसलिए दर्पण के ध्रुव से दाईं तरफ मापी जाने वाली सभी दूरियां सकारात्मक मानी जाती हैं। दूसरी तरफ, दर्पण के ध्रुव से बाईं ओर मापी जाने वाली सभी दूरियां नकारात्मक मानी जाती हैं।
  • प्रतिबिंब की दूरी (U) हमेशा नकारात्मक होती है, क्योंकि यह दर्पण के बाईं ओर रखा होता है।
  • यदि कोई प्रतिबिंब अवतल दर्पण के पीछे (दाईं ओर) बनता है, तो प्रतिबिंब की दूरी (v) सकारात्मक होगी लेकिन यदि प्रतिबिंब दर्पण के सामने (बाईं ओर) बनता है, तब प्रतिबिंब की दूरी नकारात्मक होगी।
  • उत्तल दर्पण के लिए प्रतिबिंब की दूरी (v) हमेशा सकारात्मक होगी, क्योंकि प्रतिबिंब हमेशा दाईं ओर बनता है।
  • अवतल दर्पण की फोकल दूरी (f) को नकारात्मक माना जाता है और उत्तल दर्पण के लिए इसे सकारात्मक माना जाता है।
  • वस्तु की ऊंचाई हमेशा सकारात्मक मानी जाती है। अगर प्रतिबिंब मुख्य अक्ष के ऊपर बनता है, तो उसकी ऊंचाई को सकारात्मक माना जाएगा और अगर मुख्य अक्ष के नीचे है तो उसे नकारात्मक माना जाएगा।
दर्पण सूत्र (Mirror Formula)
प्रतिबिंब की दूरी (v), वस्तु की दूरी (u) और गोलीय दर्पण की फोकल दूरी (f) के बीच संबंध बताने वाला समीकरण:
1/ प्रतिबिंब दूरी + 1/ वस्तु की दूरी= 1/ फोकल दूरी
या 1/v + 1/u=1/f
जहां v= दर्पण से प्रतिबिंब की दूरी
u= दर्पण से वस्तु की दूरी
f= दर्पण की फोकल दूरी
प्रतिबिंब की उंचाई एवं वस्तु की ऊंचाई के अनुपात को रेखीय आवर्धन (linear magnification) कहते हैं।
आवर्धन= प्रतिबिंब की उंचाई/ वस्तु की उंचाई
या m=  h2/h1
जहां m= आवर्धन, h1= प्रतिबिंब की उंचाई, h2= वस्तु की उंचाई
वस्तु की उंचाई (h1) हमेशा सकारात्मक होगी। आभासी प्रतिबिंब की उंचाई (h2) सकारात्मक होगी और वास्तविक प्रतिबिंब की उंचाई नकारात्मक होगी। दूसरे शब्दों में, अगर आवर्धन धनात्मक चिह्न से युक्त है, तब प्रतिबिंब आभासी और लंबवत होगा और अगर आवर्धन नकारात्मक चिह्न से युक्त है, तब प्रतिबिंब वास्तविक एवं उल्टा होगा।
इसके अलावा, दर्पण द्वारा उत्पादित रेखीय आवर्धन प्रतिबिंब दूरी औऱ वस्तु की दूरी के अनुपात के बराबर, ऋणात्मक चिन्ह से युक्त होता है।
आवर्धन= -प्रतिबिंब दूरी/ वस्तु दूरी
या m= -v/u
जहां m= आवर्धन, v= प्रतिबिंब दूरी, u= वस्तु दूरी
इसलिए, अगर m= h2/h1 और m= –v/u
तो, h2/h1= –v/u
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